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लोकसभा में गूंजा ‘Vande Mataram’: मोदी के संबोधन से उठा सांस्कृतिक सम्मान और शब्दों की मर्यादा का सवाल

लोकसभा में सोमवार का दिन ऐतिहासिक और कुछ हद तक भावनात्मक भी साबित हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तव्य में ‘Vande Mataram’ के महत्व पर चर्चा की। यह राष्ट्रीय गीत केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बन चुका है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि बंगाल विभाजन (1905) के समय ‘Vande Mataram’ ने लोगों में स्वदेशी भावना जगाई और यह गीत चिंगारी की तरह पूरे भारत में फैल गया।

अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को याद करते हुए कहा, “जब उन्होंने यह गीत लिखा, तो यह केवल मातृभूमि की स्तुति नहीं थी, बल्कि भारतीय अस्मिता की घोषणा थी।” इसी बीच उन्होंने एक बार उन्हें “बंकिम दा” कहकर संबोधित किया, जिस पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुदीप्त रॉय ने आपत्ति जताते हुए कहा कि उन्हें “बंकिम बाबू” कहना चाहिए।

यह छोटा-सा भाषाई मतभेद कुछ क्षणों के लिए पूरे सदन का केंद्र बन गया। प्रधानमंत्री ने तुरंत खुद को सुधारते हुए कहा, “मैं बंकिम बाबू कहूंगा, आपकी भावना का सम्मान करता हूं।” फिर उन्होंने मुस्कराते हुए सवाल किया — “क्या मैं आपको दादा बुला सकता हूं, या इसमें भी आपत्ति है?”

‘दा’ बनाम ‘बाबू’: शब्दों की संवेदनशीलता और बंगाली संस्कृति

इस संवाद ने भारत के सांस्कृतिक विविधता के उस पहलू को सामने लाया, जिसमें भाषा और संबोधन के तौर-तरीके भी सम्मान और परंपरा के मानक बन जाते हैं। बंगाली भाषा में “दा” दरअसल “दादा” का संक्षिप्त रूप है, जिसका अर्थ होता है — बड़ा भाई। यह शब्द आत्मीयता दर्शाता है और पुराने या सम्मानित व्यक्ति के लिए प्यार से कहा जाता है। वहीं “बाबू” शब्द अधिक औपचारिक है, जो शिक्षा, शालीनता और सम्मान का द्योतक है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह विवाद भाषा नहीं, बल्कि सम्मान के स्वरूप पर था। बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को न केवल एक लेखक बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक माना जाता है, वहाँ “Vande Mataram” और उससे जुड़े हर संदर्भ संवेदनशील माने जाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह सहजता से सुधार किया और अपनी बात को विनम्रता से रखा, वह लोकसभा में सभ्य संवाद का उदाहरण बन गया। उनके इस उत्तर ने सदन में हल्की मुस्कान और तालियों की गूंज भी पैदा की।

‘Vande Mataram’ की ऐतिहासिक विरासत: स्वाधीनता से आत्मनिर्भरता तक

प्रधानमंत्री के भाषण का मुख्य केंद्र ‘Vande Mataram’ ही रहा। उन्होंने कहा कि आज जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प ले रहा है, तब उसी राष्ट्रीय गीत की भावना से प्रेरणा लेनी चाहिए जो कभी स्वराज की नींव बनी थी। उन्होंने याद दिलाया कि ब्रिटिश शासन के दौरान जब बंगाल का विभाजन हुआ, तब इसी गीत ने जनता में स्वदेशी आंदोलन की चिंगारी पैदा की।

उन्होंने कहा, “जब विदेशी कंपनियों का बहिष्कार शुरू हुआ, तो उस समय से लेकर घरों के दरवाज़े, पोस्टर और यहां तक कि माचिस की डिब्बियों पर भी ‘Vande Mataram’ लिखा जाने लगा। यह केवल राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान और स्वावलंबन का प्रतीक बन गया।”

लोकसभा में गूंजा ‘Vande Mataram’: मोदी के संबोधन से उठा सांस्कृतिक सम्मान और शब्दों की मर्यादा का सवाल

प्रधानमंत्री ने आगे महात्मा गांधी का भी उल्लेख किया, जिन्होंने दिसंबर 1905 के Indian Opinion पत्र में लिखा था कि ‘Vande Mataram’ की लोकप्रियता इतनी गहरी थी कि यह भारत का स्वाभाविक राष्ट्रगीत बन चुका था। गांधीजी ने इसे अन्य देशों के राष्ट्रीय गीतों से अधिक भावनात्मक और मधुर बताया था।

मोदी ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा महान गीत कालांतर में उपेक्षित क्यों हुआ? क्यों इसे लेकर विभाजन जैसी त्रासदी के दौरान विवाद खड़े हुए? प्रधानमंत्री ने इसे “असली भारत माता के सम्मान की बहाली” का क्षण बताया और कहा कि “आज की पीढ़ी को इस गीत की गहराई को फिर से समझने की जरूरत है।”

संस्कृति, राजनीति और भावनाओं का संगम

Vande Mataram’ का अर्थ केवल “माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ” नहीं है; यह एक विचारधारा है — मातृभूमि को देवी के रूप में देखना, उसकी मिट्टी को पूज्य मानना और उसके लिए बलिदान देने की भावना रखना। समय के साथ इस गीत का उपयोग कई राजनीतिक दलों ने अपने-अपने ढंग से किया, लेकिन इसकी जड़ें संस्कृति में हैं, राजनीति में नहीं।

आज के भारत में जब आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat) और विकसित भारत 2047 जैसे लक्ष्य सामने हैं, ‘Vande Mataram’ का विचार फिर से प्रासंगिक हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जैसे स्वतंत्रता संग्राम के समय यह गीत प्रेरणा बना, ठीक वैसे ही आज यह नवभारत के निर्माण की प्रेरणा बन सकता है।

संसद में हुई यह बहस इस बात का भी प्रतीक थी कि भारत में भावनाएं, संस्कृति और राजनीति एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हैं। एक शब्द के प्रयोग पर हुई चर्चा केवल भाषाई नहीं थी — यह उस संवेदनशीलता का उदाहरण थी जो भारत जैसे विविध समाज को एक सूत्र में बांधती है।

लोकसभा में ‘Vande Mataram’ की गूंज केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं थी, बल्कि वर्तमान को दिशा देने का भी संदेश थी। मोदी के शब्दों में — “कुछ महान लोग स्वतंत्र भारत का सपना देखते थे; आज की पीढ़ी समृद्ध भारत का सपना देख रही है। दोनों के लिए प्रेरणा स्रोत एक ही है — Vande Mataram।”

आज के संदर्भ में ‘Vande Mataram’ की प्रासंगिकता

आधुनिक भारत में जब युवाओं के सामने तकनीकी क्रांति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक संतुलन जैसी चुनौतियाँ हैं, ‘Vande Mataram’ नई प्रेरणा का माध्यम बन सकता है। यह गीत बताता है कि आत्मनिर्भरता, एकता और मातृभूमि के प्रति सम्मान किसी भी राष्ट्र की मूल शक्ति हैं।

देशभर के शैक्षणिक संस्थानों, सांस्कृतिक समारोहों और सरकारी कार्यक्रमों में अगर ‘Vande Mataram’ को पुनः सार्थक भाव से शामिल किया जाए, तो यह केवल परंपरा का निर्वाह नहीं होगा, बल्कि युवाओं के भीतर देशभक्ति की चेतना जागृत करेगा।

दूसरी ओर, भाषाई संवेदनशीलता को लेकर संसद में जो प्रसंग सामने आया, उसने यह भी सिखाया कि सम्मान केवल भाव का नहीं, शब्दों का भी होना चाहिए। राजनीतिक भिन्नताओं के बावजूद जिस शालीनता से प्रधानमंत्री और विपक्षी सांसदों ने संवाद किया, वह लोकतांत्रिक परिपक्वता की मिसाल है।

सदन में गूंजा यह गीत फिर से याद दिलाता है कि ‘Vande Mataram’ केवल स्वतंत्रता का स्मारक नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की पुकार है। यह गीत हमें जोड़ता है — भाषा से आगे, क्षेत्र से परे, और राजनीति से ऊपर।

प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि “अब हमें आत्मनिर्भर और विकसित भारत बनाना है”, दरअसल उसी चेतना का पुनर्जागरण है जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने शब्द रूप दिया था। चाहे ‘दा’ कहें या ‘बाबू’, उनका योगदान राष्ट्र की चेतना का हिस्सा है — और ‘Vande Mataram’ उस चेतना का शाश्वत गीत।

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