हाल ही में पाकिस्तान का हमला तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के चीफ नूर वली महसूद पर हुआ। यह हमला नाकाम रहा और इसके साथ ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों में ज़बरदस्त तनाव देखने को मिला। अब पाकिस्तान का हमला दोनों देशों के लिए नये डिप्लोमैटिक और सुरक्षा संकट का कारण बना है। इस लेख में हम जानेंगे, पाक-अफगान संबंधों पर इस हमले का असर और आगे की चुनौतियों पर विस्तार से।
पाकिस्तान का हमला और बढ़ता सैन्य दबाव
पाकिस्तान का हमला टीटीपी चीफ को निशाना बनाकर किया गया था। हालांकि इसमें सफलता नहीं मिली और महसूद बच गया। अब वह अफगान तालिबान की कस्टडी में है। अफगानिस्तान ने इस हमले को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया है। पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि टीटीपी या तालिबान से अब कोई बातचीत नहीं होगी, सिर्फ सैन्य कार्रवाई होगी।
इस साल पाकिस्तान में आतंकी घटनाएं कई गुना बढ़ गयी हैं। खासकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में पाकिस्तान का हमला और सुरक्षा बलों पर हमले बढ़े हैं। बलोच लिबरेशन आर्मी और बलोच लिबरेशन फ्रंट जैसे गुट भी टीटीपी के साथ साझा अभियान चला रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान का हमला सैन्य दबाव का एक बड़ा उदाहरण बन गया है। सेना ने अब ‘नो नेगोशिएशन’ नीति अपनाई है, जिससे उन्हें जनता का समर्थन भी मिल रहा है।
सिर्फ नौ महीनों में बीस से ज्यादा सेना अधिकारी मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान का हमला अब पाकिस्तानी सशस्त्र बलों के लिए एक बड़ी चुनौती है और सरकार पर जनता का दबाव भी बढ़ रहा है।
अफगानिस्तान में बदलती स्थिति और नया डिप्लोमैटिक समीकरण
पाकिस्तान का हमला केवल सैन्य विषय नहीं रहा, अब यह क्षेत्रीय कूटनीति का हिस्सा बन चुका है। अफगानिस्तान ने इस हमले के बाद भारत, ईरान और रूस के साथ संबंध बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी का नई दिल्ली दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है। मुत्ताकी ने भारत को क्षेत्रीय बैलेंसिंग फोर्स बताया और पाकिस्तान की कहानी को सिरे से नकार दिया।
अब काबुल पूरी तरह भारत, ईरान और रूस की तरफ बढ़ रहा है। तीनों देश पाकिस्तान की ‘मिलिट्री-स्ट्रैटेजी’ से परेशान हैं और खुलकर विरोध जता रहे हैं। अफगान तालिबान की ओर से भी टीटीपी को अधिक सहनशीलता मिलने की संभावना बढ़ी है। इससे पाकिस्तान का हमला अब सिर्फ बॉर्डर नहीं, पूरे इलाके की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं, पाकिस्तान की आक्रामक नीति के कारण आस-पास के सभी देश सतर्क हो गए हैं। इस बार पाकिस्तान का हमला उसे क्षेत्रीय अलगाव की ओर ले जा रहा है। अफगान तालिबान की नज़रअंदाजी का सीधा फायदा टीटीपी और अन्य आतंकी गुट उठा सकते हैं, जिससे पाकिस्तान की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
बाहरी समर्थन और पाकिस्तान का भविष्य
पाकिस्तान का हमला असफल होने के बावजूद, अमेरिका और चीन पाकिस्तानी सेना को लॉजिस्टिक, इंटेलिजेंस और फाइनेंशियल सपोर्ट दे रहे हैं। दोनों देशों के लिए पाकिस्तान की स्थिरता रणनीतिक रूप से जरूरी है। अमेरिका को डर है कि अगर पाकिस्तान कमजोर पड़ा तो अफगानिस्तान में आतंकी नेटवर्क वापस फलेगा। चीन को सीपीईसी (सी-पैक) की सुरक्षा की चिंता है। पाकिस्तान के लिए फंडिंग की कोई दिक्कत नहीं है, किंतु क्या बाहरी समर्थन उसकी आतंरिक समस्याओं का हल निकाल पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।
पाकिस्तान का हमला अपनी ही बनाई रणनीति में उलझ गया है। अफगान तालिबान, भारत, ईरान और रूस जैसे देशों के खुलते विरोध ने पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। साथ ही, टीटीपी के हमलों में वृद्धि और अफसरों के मारे जाने ने सुरक्षा बलों की चिंता बढ़ा दी है। इस हालात में पाकिस्तान का हमला अब एक राजनीतिक, डिप्लोमैटिक और सैन्य संकट का प्रतीक बन चुका है।
आखिरकार, पाकिस्तान का हमला केवल एक सैन्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि पूरी क्षेत्रीय राजनीति के लिए बड़ा संकेत है। अफगानिस्तान और क्षेत्रीय समीकरणों में आए बदलावों के साथ, पाकिस्तान को अपनी रणनीति पर फिर से सोचने की जरूरत है। आने वाले समय में पाकिस्तान का हमला पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों को किस दिशा में ले जाएगा, यह देखना बेहद अहम होगा
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