सऊदी अरब ने कफाला प्रथा को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। यह 50 साल पुराना सिस्टम था जो प्रवासी मजदूरों के शोषण का बड़ा कारण था। इस फैसले से करीब 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूरों, जिनमें 25 लाख से अधिक भारतीय शामिल हैं, को बड़ी राहत मिली है। इस महत्वपूर्ण कदम को मानवाधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है।
कफाला प्रथा क्या थी?
कफाला प्रथा शब्द अरबी भाषा का है जिसका अर्थ ‘स्पॉन्सरशिप’ होता है। यह प्रणाली 1950 के दशक में खाड़ी देशों ने अपनाई थी। इसके तहत प्रवासी मजदूरों का वीजा, नौकरी, रहने और देश छोड़ने का अधिकार उनके नियुक्त नियोक्ता या कफील के पास होता था। मजदूर बिना अपने कफील की अनुमति के नौकरी बदलने या देश छोड़ने के लिए स्वतंत्र नहीं थे। इस वजह से कई बार मजदूरों को अमानवीय परिस्थितियों में काम करना पड़ता था, उनका पासपोर्ट जब्त कर लिया जाता था, वेतन रोका जाता था और शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। इसी कारण इसे ‘आधुनिक गुलामी’ कहा जाता था।

बदलाव की वजह और इसका प्रभाव
14 अक्टूबर 2025 को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस व्यवस्था को समाप्त करने का ऐलान किया। यह कदम उनके ‘विजन 2030’ सुधार योजना का हिस्सा है जिसमें सऊदी अरब अपनी आर्थिक और सामाजिक प्रणाली को आधुनिक बनाना चाहता है। अब मजदूर बिना अपने नियोक्ता की इजाजत के नौकरी बदल सकते हैं, देश छोड़ सकते हैं और सीधे श्रम कोर्ट में अपनी समस्या लेकर जा सकते हैं।
इस बदलाव से लाखों भारतीयों सहित अन्य देशों के प्रवासी मजदूरों की जिंदगी में सुधार आएगा। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, सऊदी अरब में काम करने वाले करीब 25 लाख भारतीय इस फैसला से सीधे लाभान्वित होंगे। इससे पहले कफाला व्यवस्था के कारण मजदूरों को कई तरह की मजबूरियां झेलनी पड़ती थीं, जिनमें से कुछ गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन भी थे।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ कानून बदलने से सबकुछ नहीं सुधरेगा। इसका प्रभाव तभी होगा जब नए कानूनों को सही तरीके से लागू किया जाए और मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा की जाए।
अभी भी बाकी गल्फ देश
वहीं, कफाला प्रथा अभी भी कई अन्य खाड़ी देशों में मौजूद है। यूएई, कुवैत, बहरीन, ओमान जैसे देशों ने कुछ सीमा तक सुधार किए हैं लेकिन पूरी तरह से इसे खत्म नहीं किया है। 2022 में कतर ने फीफा वर्ल्ड कप के पहले कफाला सिस्टम में कुछ राहत दी थी, परंतु मजदूरों के अधिकार पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हुए हैं। ऐसे में इलाके के अन्य देशों से भी उम्मीद है कि वे जल्द ही इस सिस्टम का पूरी तरह से अंत करें।

सऊदी अरब का यह कदम प्रवासी मजदूरों के अधिकारों के लिए एक बड़ी जीत है। इससे खाड़ी में कामगारों की जिंदगी बेहतर होगी और वे अपने अधिकारों के लिए सक्षम होंगे। यह बदलाव आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय को भी मजबूत करेगा।
प्रमुख बातें
- कफाला प्रथा लगभग 50 वर्षों से खाड़ी देशों में थी।
- यह स्पॉन्सरशिप सिस्टम था जिसमें मजदूर को नियोक्ता से बंधा जाता था।
- सऊदी अरब ने अक्टूबर 2025 में इसे पूरी तरह खत्म कर दिया।
- करीब 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूरों को राहत मिली है।
- 25 लाख से अधिक भारतीय इस बदलाव से लाभान्वित होंगे।
- मजदूर अब स्वतंत्र रूप से नौकरी बदल और देश छोड़ सकेंगे।
- अन्य खाड़ी देशों में अभी भी कफाला की पाबंदियां जारी हैं।
यह परिवर्तन न सिर्फ मजदूरों को आजादी देता है, बल्कि खाड़ी देशों की सामाजिक छवि को भी बेहतर बनाएगा। प्रवासी मजदूरों के लिए बेहतर कानून और उनका enforcement जरूरी है ताकि वे सम्मान और गरिमा के साथ अपने जीवन का निर्वाह कर सकें।
सऊदी अरब के इस निर्णय से दुनिया भर के लाखों प्रवासी मजदूरों को उम्मीद और सुरक्षा मिली है। यह कदम मजदूरों के अधिकारों की दिशा में उठाया गया एक बड़ा और साहसी कदम है, जो अन्य देशों के लिए प्रेरणा भी बनेगा।
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